Published on March 26, 2026 | Views: 179
रितिक अग्रवाल:
वृंदावन। चैत्र नवरात्रि के पावन उपलक्ष्य में कान्हा की नगरी वृंदावन पूरी तरह शक्ति की भक्ति में डूबी नजर आ रही है। श्री धाम वृंदावन के सुप्रसिद्ध कात्यायनी मंदिर में अष्टमी और नवमी के पावन मिलन के अवसर पर भव्य 'संधि आरती' का आयोजन किया गया। इस अलौकिक दृश्य का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु मंदिर प्रांगण में एकत्रित हुए, जिससे पूरा वातावरण 'जय माता दी' के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।
कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी देते हुए मंदिर की ट्रस्टी रवि दयाल ने बताया कि यहाँ संधि आरती की यह गौरवशाली परंपरा पिछले 100 वर्षों से भी अधिक समय से अनवरत चली आ रही है। उन्होंने कहा, "अष्टमी तिथि के समापन और नवमी के प्रारंभ का समय 'संधि काल' कहलाता है। शास्त्रों में इस समय का विशेष महत्व है और मान्यता है कि इस क्षण माता के दर्शन करने से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के कष्ट दूर हो जाते हैं।"
मंदिर के प्रबंधक विजय मिश्र ने बताया कि मुख्य आकर्षण मंदिर के पुजारियों द्वारा भक्तों के बीच 'माता का खजाना' लुटाना रहा। आरती के पश्चात जैसे ही पुजारियों ने मंच से सिक्के, टॉफी, बिस्कुट और अन्य सामग्री भक्तों की ओर उछालनी शुरू की, पूरा प्रांगण हर्षोल्लास से भर गया। इस 'दिव्य खजाने' को पाने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह और होड़ देखने को मिली। हर कोई माता के इस प्रसाद रूपी खजाने का एक अंश अपने आंचल में समेट लेना चाहता था।
ऐसी अटूट धार्मिक मान्यता है कि संधि आरती के समय लुटाए गए इस खजाने (सिक्कों) को यदि कोई भक्त अपने घर ले जाकर अपनी तिजोरी या धन-स्थान पर रखता है, तो उस पर वर्ष भर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है। भक्तों का विश्वास है कि यह केवल सिक्के नहीं, बल्कि सुख-समृद्धि का आशीर्वाद है जो दरिद्रता का नाश करता है।
भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर प्रशासन और स्थानीय पुलिस द्वारा सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम किए गए थे। शंख, घंटों और नगाड़ों की थाप के बीच संपन्न हुई इस भव्य आरती ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। देर रात तक मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहा और हर कोई इस आध्यात्मिक ऊर्जा को अपने भीतर संजोए नजर आया।
मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विष्णु प्रकाश, नरेश दयाल, रवि दयाल, संजय बहादुर, नरेंद्र गोहिल, प्रीति, मंदिर प्रबंधक विजय मिश्र सहित सैकड़ों भक्त मौजूद रहे।
Category: Dharm