Published on October 16, 2026 | Views: 239
मथुरा। जीएल बजाज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, मथुरा में आयोजित दो दिवसीय आईसी3 अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन नवीन तकनीकों पर व्यापक चर्चा के साथ हुआ। सम्मेलन में देश-विदेश के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), क्वांटम कम्प्यूटिंग, हाई परफॉर्मेंस कम्प्यूटिंग (एचपीसी), डीएनए आधारित डेटा स्टोरेज और सतत विकास में तकनीक की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। विशेषज्ञों ने इन क्षेत्रों में हो रहे अनुसंधानों, उनके व्यावहारिक उपयोग और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। सम्मेलन के लिए 800 से अधिक शोध-पत्र प्राप्त हुए, जबकि विभिन्न तकनीकी सत्रों में लगभग 185 शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए।
डीए-आईआईसीटी, गांधीनगर के प्रो. मनीष कुमार गुप्ता ने ‘द वंडर्स ऑफ डीएनए: ए स्टोरी ऑफ लाइफ एंड कम्प्यूटेशन’ विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि डीएनए केवल आनुवंशिक जानकारी का वाहक नहीं, बल्कि भविष्य में डेटा संग्रहण और कम्प्यूटेशन का प्रभावी माध्यम भी बन सकता है। उन्होंने कहा कि एक ग्राम सिंथेटिक डीएनए में लगभग 2.2 पेटाबाइट डेटा संग्रहित करने की क्षमता का अनुमान है। यह तकनीक भविष्य में अत्यंत सघन डेटा स्टोरेज के नए विकल्प उपलब्ध करा सकती है। उन्होंने विद्यार्थियों को जीव विज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान और गणित के समन्वय से विकसित हो रहे इस क्षेत्र में अनुसंधान के लिए प्रेरित किया।
जर्मनी के यूनिवर्सिटी ऑफ स्टटगार्ट के डॉ. जोहानेस गेर्बर्ट ने सेरेब्रास हार्डवेयर और एल्गोरिदम के माध्यम से उच्च प्रदर्शन कम्प्यूटिंग को गति देने पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि सेरेब्रास चिप में एक विशाल सिलिकॉन वेफर को एकीकृत चिप के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें लगभग 8.5 लाख कोर होते हैं और प्रत्येक कोर की अपनी मेमोरी होती है। उनके अनुसार, कई बार कम्प्यूटिंग की गति से अधिक डेटा को मेमोरी तक पहुंचाने की क्षमता प्रदर्शन को प्रभावित करती है। ऐसी तकनीक इस बाधा को कम कर सकती है, हालांकि इसकी अधिक लागत और सीमित उपयोगिता जैसी चुनौतियां भी हैं।
किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, सऊदी अरब के डॉ. समर असीरी ने साझा सुपरकम्प्यूटिंग संसाधनों से पाई (π) जैसी गणितीय संख्या के अत्यधिक बड़े अंकों की गणना पर व्याख्यान दिया। उन्होंने स्टोरेज की सीमाओं, गणना में त्रुटियों की पहचान और लम्बे समय तक चलने वाली प्रक्रियाओं को दोबारा शुरू करने जैसी चुनौतियों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि संसाधनों का उचित प्रबंधन जटिल गणनाओं की गति और दक्षता बढ़ाने में सहायक हो सकता है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ आईटी के प्रो. अमलान चक्रवर्ती ने क्वांटम नेटवर्क मॉडल यानी क्यूकेएएन की कार्यप्रणाली समझाई। उन्होंने बताया कि यह दृष्टिकोण क्वांटम तकनीक और मशीन लर्निंग के समन्वय पर आधारित है। इसका उद्देश्य ऐसे प्रभावी मॉडल विकसित करना है, जिनका उपयोग वर्तमान में उपलब्ध सीमित क्षमता वाले क्वांटम कम्प्यूटरों पर भी किया जा सके।
स्वीडन की ओरेब्रो यूनिवर्सिटी के प्रो. कौस्तुव दलाल ने ‘बियॉन्ड द एल्गोरिदम: कैन एआई क्रिएट हेल्दियर सोसाइटीज?’ विषय पर स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कल्याण में एआई की भूमिका स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि एआई रोगों की पहचान, सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी और स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच बेहतर बनाने में उपयोगी हो सकता है। हालांकि, इसकी सफलता केवल तकनीकी सटीकता से नहीं, बल्कि सामाजिक असमानताओं को कम करने और लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने में उसके योगदान से भी आंकी जानी चाहिए। इसके लिए निष्पक्षता, पारदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी आवश्यक है।
आईबीएम रिसर्च, इंडिया के डॉ. रिताजित मजूमदार ने ‘एआई मीट्स क्वांटम’ विषय पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कम्प्यूटिंग के बीच उभरते संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि क्वांटम कम्प्यूटिंग कुछ विशिष्ट जटिल समस्याओं के समाधान के नए अवसर प्रदान कर सकती है। साथ ही, उन्होंने दोनों तकनीकों के संयुक्त उपयोग, वास्तविक क्वांटम हार्डवेयर की सम्भावनाओं और इस क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों पर प्रकाश डाला। क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के एनसीआर कैम्पस, गाजियाबाद के डॉ. कमल उप्रेती ने ‘एआई एंड एसडीजीज: इनोवेटिंग फॉर अ सस्टेनेबल फ्यूचर’ विषय पर सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में एआई की उपयोगिता बताई। उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु निगरानी जैसे क्षेत्रों में आधुनिक तकनीक महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। इसके लिए तकनीक का जिम्मेदार उपयोग और उसके लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाना जरूरी है।
सम्मेलन में हुई चर्चाओं ने विद्यार्थियों और शोधार्थियों के सामने आधुनिक तकनीक के विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान, नवाचार और बहुविषयक सहयोग की नई सम्भावनाएं प्रस्तुत कीं। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीकी प्रगति को सार्थक बनाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ उसका जिम्मेदार और जनहितकारी उपयोग भी सुनिश्चित करना होगा। सम्मेलन के सफल आयोजन में डॉ. वी.के. सिंह, डॉ. रामवीर सिंह सेंगर, डॉ. राजीव कुमार सिंह, डॉ. वज़ीर सिंह, डॉ. शिखा गोविल, सर्वेश प्रकाश द्विवेदी और प्रज्ञा सिंह सहित अन्य सदस्यों का सराहनीय योगदान रहा। इस अवसर पर डीन, सीएसई एचओडी संजीव सिंह, ऋचा मिश्रा आदि उपस्थित रहे। समापन अवसर पर संस्थान की निदेशक प्रो. नीता अवस्थी तथा डॉ. वी.के. सिंह ने अतिथि वक्ताओं, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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