Published on September 7, 2026 | Views: 260
वृंदावन। पंचकोसीय परिक्रमा मार्ग स्थित छत्तीसगढ़ कुंज में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का अंतिम दिवस भक्ति और भावनाओं से सराबोर रहा। कथा व्यास एवं तुलसी पीठ के उत्तराधिकारी तथा छत्तीसगढ़ कुंज के महंत आचार्य रामचंद्र दास महाराज ने सुदामा चरित्र, परीक्षित मोक्ष और श्रीमद्भागवत कथा की फलश्रुति का प्रसंग सुनाकर श्रद्धालुओं को भक्तिभाव से जोड़ दिया। कथा के दौरान कृष्ण-सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं और कथा पंडाल राधे-राधे तथा जय श्रीकृष्ण के जयकारों से गूंज उठा।
कथा के अंतिम दिवस व्यास पीठ और श्रीमद्भागवत ग्रंथ का पूजन किया गया। इसके बाद कथा व्यास आचार्य रामचंद्र दास महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा के बाल्यकाल से लेकर द्वारका में हुए पुनर्मिलन तक का प्रसंग भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि कृष्ण-सुदामा की मित्रता संसार को यह संदेश देती है कि सच्चे रिश्ते में धन, पद और प्रतिष्ठा का कोई स्थान नहीं होता। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने निर्धन मित्र सुदामा को जिस आत्मीयता से गले लगाया, वह निष्काम प्रेम और समानता का अनुपम उदाहरण है।
मुट्ठी भर चावल में भगवान ने देखा मित्र का भाव
सुदामा द्वारा भगवान श्रीकृष्ण के लिए लाई गई चावल की पोटली का प्रसंग सुनाते हुए आचार्य रामचंद्र दास महाराज ने कहा कि भगवान के लिए भक्त की भेंट का मूल्य नहीं, उसके पीछे छिपा भाव महत्वपूर्ण होता है। सुदामा के पास देने के लिए बहुत कुछ नहीं था, लेकिन उनके हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति अपार प्रेम था। भगवान ने उसी प्रेम को स्वीकार किया।
उन्होंने दृष्टांत देते हुए कहा कि जिस प्रकार मां के लिए बच्चे का दिया हुआ छोटा-सा उपहार भी अत्यंत मूल्यवान होता है, उसी प्रकार परमात्मा भी भक्त की छोटी-सी भेंट को उसके निष्कपट भाव के कारण स्वीकार करते हैं। इसलिए भक्ति में दिखावे के बजाय मन की पवित्रता आवश्यक है।
इसके बाद कथा व्यास ने राजा परीक्षित मोक्ष का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि मनुष्य को जीवन की नश्वरता को समझकर अपने कर्मों को धर्म, सेवा और सदाचार से जोड़ना चाहिए। परीक्षित ने मृत्यु सामने देखकर सांसारिक मोह के बजाय भगवान की कथा का आश्रय लिया। यही भागवत का संदेश है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य परमात्मा का स्मरण और सद्कर्मों के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग अपनाना है।
आचार्य रामचंद्र दास महाराज ने कहा कि सात दिनों तक कथा सुनने का उद्देश्य केवल धार्मिक आयोजन में शामिल होना नहीं, बल्कि कथा के संदेश को जीवन में उतारना है। मनुष्य के व्यवहार में प्रेम, करुणा, सेवा, संयम और सद्भाव दिखाई देने लगे तो भागवत श्रवण सार्थक माना जाएगा।
कथा के समापन अवसर पर भगवान की आरती की गई। संत-महात्माओं और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आरती में सहभागिता की। इसके साथ ही सभी के सुख-शांति, समृद्धि और कल्याण तथा विश्व शांति की मंगलकामना की गई। सात दिनों तक चले कथा ज्ञान यज्ञ के समापन पर छत्तीसगढ़ कुंज का वातावरण भक्तिमय बना रहा।
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