Published on December 22, 2025 | Views: 510
नई दिल्ली,: ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन (TTZ) जैसे अत्यंत संवेदनशील पर्यावरणीय क्षेत्र में नियामक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हुए, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने बुधवार को मूल आवेदन संख्या 649/2025 (आईए संख्या 816/2025) पर सुनवाई करते हुए, जिसे आइटम नंबर-3 के रूप में सूचीबद्ध किया गया था, सनसिटी हाई-टेक टाउनशिप परियोजना (ग्राम चटीकरा एवं सुनरख बंजर, मथुरा) के संबंध में नोटिस जारी किया।
अधिकरण ने इस प्रकरण में उत्तर प्रदेश राज्य सरकार, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB), राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA-UP), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC), केंद्रीय भू-जल प्राधिकरण (CGWA), प्रभागीय वन अधिकारी/वन विभाग मथुरा, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA), जिलाधिकारी/कलेक्टर मथुरा तथा एम/एस सनसिटी हाई-टेक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता अशुतोष सिंह को नोटिस जारी किया है।
“परियोजना के पास संचालन हेतु एक भी मूल अनुमति नहीं”
याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत होते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता श्री नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने परियोजना पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह परियोजना एक भी मूलभूत वैधानिक अनुमति के बिना चल रही है।
सीख़े हुए अधिवक्ता ने अधिकरण के समक्ष यह स्पष्ट किया कि परियोजना के पास:
• न तो Consent to Establish (CTE) है,
• न ही Consent to Operate (CTO),
• कोई कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) नहीं,
• सीवेज को टैंकरों से बाहर ले जाया जा रहा है—जो किसी तथाकथित आधुनिक परियोजना में एक मध्ययुगीन प्रथा है,
• कोई प्रभावी पर्यावरण प्रबंधन योजना (EMP) लागू नहीं, तथा
• सबसे गंभीर तथ्य यह कि UPPCB स्वयं इस परियोजना के लिए CTE अस्वीकृत करने की सिफारिश कर चुका है, जिसे परियोजना ने निर्लज्जता से नज़रअंदाज़ कर दिया।
अधिवक्ता गोस्वामी ने कहा:
“जब नियामक स्वयं अनुमति अस्वीकार करने की सिफारिश करे और उल्लंघनकर्ता उसे अनदेखा कर आगे बढ़े, तो यह मान लेना चाहिए कि कानून के शासन को कार्डियक अरेस्ट आ चुका है।”
ईसी कोई ‘हंटिंग लाइसेंस’ नहीं, बल्कि टूटा हुआ सामाजिक अनुबंध है।
अधिवक्ता ने आगे तर्क दिया कि पर्यावरणीय स्वीकृति (Environmental Clearance – EC) को शिकार करने के लाइसेंस की तरह नहीं देखा जा सकता।
“ईसी एक सामाजिक अनुबंध है, जो कठोर शर्तों से बंधा होता है। अनुपालन रिपोर्ट न देना और पर्यावरण प्रबंधन योजना को लागू न करना यह सिद्ध करता है कि यह सामाजिक अनुबंध पूरी तरह टूट चुका है। इस मामले में ईसी आत्मा-विहीन कागज़ का एक टुकड़ा मात्र बनकर रह गई
है।”
टीटीज़ेड में 400 से अधिक पेड़ों की कटाई; MVDA पर अवैधता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
अधिकरण को यह भी बताया गया कि ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में 400 से अधिक परिपक्व पेड़ों की कटाई की गई है, वह भी बिना वैधानिक अनुमतियों के।
जहाँ एक ओर पर्यावरणीय नियामक संस्थाएँ इन अवैधताओं का दस्तावेज़ीकरण कर रही थीं, वहीं दूसरी ओर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA), अधिवक्ता के अनुसार, इन्हीं अवैधताओं को सुविधाजनक बना रहा था।
दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए अधिवक्ता गोस्वामी ने कहा कि:
• जून 2025 में MVDA द्वारा परियोजना को लाइसेंस प्रदान किया गया, तथा
• निजी प्रतिवादियों को लाभ पहुँचाने हेतु भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आरंभ की गई।
भूमि अधिग्रहण अधिकारी के उत्तर से यह स्पष्ट होता है कि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्तमान में भी जारी है।
“यह,” अधिवक्ता ने कहा, “रेगुलेटरी कैप्चर की परिभाषा है—जहाँ राज्य की मशीनरी कानून लागू करने के लिए नहीं, बल्कि कानून तोड़ने वालों की सेवा के लिए काम कर रही है।”
अधिकारियों और बिल्डर के बीच गंभीर सांठगांठ के आरोप
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारियों और बिल्डर के बीच गहरी सांठगांठ है। पर्यावरणीय उल्लंघनों के दस्तावेज़ी प्रमाण होने के बावजूद विकास प्राधिकरणों द्वारा परियोजना को संरक्षण दिया जा रहा है, जिससे पर्यावरणीय शासन की जड़ें हिल गई हैं।
अगली सुनवाई 13 मार्च 2026 को होगी।
यह मामला माननीय श्री न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव (अध्यक्ष) एवं माननीय डॉ. ए. सेंथिल वेल (विशेषज्ञ सदस्य) की पीठ के समक्ष प्रस्तुत हुआ। अधिकरण ने सभी प्रतिवादियों से विस्तृत जवाब तलब करते हुए मामले की अगली सुनवाई 13 मार्च 2026 को नियत की है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला यह तय करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है कि क्या विकास प्राधिकरण ऐसे प्रोजेक्ट्स को वैध रूप से सहायता दे सकते हैं, जो स्वयं मूलभूत पर्यावरणीय अवैधताओं के आरोपों से घिरे हों।
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