Published on August 20, 2026 | Views: 643
मथुरा। शासन की ओर से आमजन की शिकायतों के त्वरित और गुणवत्तापूर्ण निस्तारण के लिए संचालित आईजीआरएस व्यवस्था मथुरा में सवालों के घेरे में है। आरोप है कि जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्तर पर आईजीआरएस शिकायतों के निस्तारण में कई मामलों में शिकायतकर्ता से बातचीत किए बिना ही रिपोर्ट लगाकर शिकायत को निस्तारित कर दिया जाता है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आईजीआरएस पर शिकायत दर्ज कराने के बाद संबंधित विभाग द्वारा महज औपचारिकता पूरी करते हुए रिपोर्ट लगा दी जाती है। कई मामलों में शिकायतकर्ता की समस्या का वास्तविक समाधान हुआ या नहीं, इसकी जानकारी लिए बिना ही शिकायत को निस्तारित दिखा दिया जाता है।
शिकायतकर्ता से संवाद के बिना कैसे हुआ गुणवत्तापूर्ण निस्तारण?
आईजीआरएस का मूल उद्देश्य शिकायतकर्ता की समस्या को सुनना, उसका परीक्षण करना और निष्पक्ष जांच के बाद समाधान उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि शिकायतकर्ता से वार्ता किए बिना ही शिकायत का निस्तारण कर दिया जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिकायतकर्ता की वास्तविक समस्या अधिकारियों तक पहुंची कैसे और समाधान की गुणवत्ता का आकलन किस आधार पर किया गया?
कई शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जांच के नाम पर संबंधित अधिकारी या कर्मचारी से रिपोर्ट लेकर उसी रिपोर्ट को आधार बनाकर शिकायत बंद कर दी जाती है। शिकायतकर्ता के बयान, दस्तावेज और मौके की वास्तविक स्थिति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।
कागजों में निस्तारण, धरातल पर समस्या बरकरार
आईजीआरएस में शिकायत निस्तारण का प्रतिशत बेहतर दिखाने के लिए शिकायतों को समय सीमा के भीतर निस्तारित करना आवश्यक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल पोर्टल पर शिकायत बंद कर देना ही गुणवत्तापूर्ण निस्तारण है?
यदि शिकायतकर्ता की मूल समस्या बनी रहती है और वह दोबारा उसी विषय पर शिकायत करने के लिए मजबूर होता है तो यह व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।
डीएम और एसएसपी स्तर पर निगरानी की जरूरत
जिलाधिकारी और एसएसपी जिले में आईजीआरएस शिकायतों के निस्तारण की गुणवत्ता की निगरानी के लिए जिम्मेदार प्रमुख अधिकारियों में शामिल हैं। ऐसे में जरूरत है कि संवेदनशील और गंभीर शिकायतों का केवल अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट के आधार पर निस्तारण न किया जाए, बल्कि शिकायतकर्ता से सीधे संवाद कर वास्तविक स्थिति की पुष्टि की जाए।
विशेष रूप से भूमि विवाद, पुलिस उत्पीड़न, अवैध कब्जे, राजस्व संबंधी मामलों और गंभीर शिकायतों में शिकायतकर्ता का पक्ष सुने बिना निस्तारण किए जाने पर निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।
क्या होगी शिकायतों की दोबारा जांच?
अब सवाल यह है कि पिछले कुछ महीनों में निस्तारित की गई आईजीआरएस शिकायतों में कितने शिकायतकर्ताओं से अधिकारियों ने स्वयं वार्ता की? कितनी शिकायतों में मौके पर जाकर जांच की गई? कितने मामलों में शिकायतकर्ता की संतुष्टि दर्ज की गई? और कितनी शिकायतों के निस्तारण के बाद शिकायतकर्ता ने दोबारा शिकायत की?
यदि इन बिंदुओं पर स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए तो आईजीआरएस निस्तारण की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
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